

Review: Book - Khubsurat kitab Review: Some stories don’t end—they echo. - Bedawa is not a mere love story—it is a journey through shadows, silences, and the unseen corners of the human soul. In its pages, love is no longer bound by man and woman alone; it becomes a philosophy, a pulse of humanity that rises even in the ruins of despair. Through Aparna, Sudhir, Adeeb, and the haunting memory of Jivesh, the narrative traverses fragile spaces—modern campuses, crowded streets, hushed forests, and the tender world of candles and light. Each character is a mirror of yearning, carrying wounds carved by society’s gaze, religion’s rigidity, and the merciless weight of memory. The book is both intimate and universal, a delicate balance of poetic prose and philosophical reflection. Its beauty lies not just in what it says, but in what it leaves unsaid—in the silences between voices, in the unfinished promises of love, and in the eternal ache of incompleteness. Bedawa whispers that even in brokenness, there is light. And even in silence, love finds its most haunting language.
| Best Sellers Rank | #219,640 in Books ( See Top 100 in Books ) #13,580 in Contemporary Fiction (Books) |
| Customer Reviews | 4.5 out of 5 stars 118 Reviews |
J**V
Book
Khubsurat kitab
M**A
Some stories don’t end—they echo.
Bedawa is not a mere love story—it is a journey through shadows, silences, and the unseen corners of the human soul. In its pages, love is no longer bound by man and woman alone; it becomes a philosophy, a pulse of humanity that rises even in the ruins of despair. Through Aparna, Sudhir, Adeeb, and the haunting memory of Jivesh, the narrative traverses fragile spaces—modern campuses, crowded streets, hushed forests, and the tender world of candles and light. Each character is a mirror of yearning, carrying wounds carved by society’s gaze, religion’s rigidity, and the merciless weight of memory. The book is both intimate and universal, a delicate balance of poetic prose and philosophical reflection. Its beauty lies not just in what it says, but in what it leaves unsaid—in the silences between voices, in the unfinished promises of love, and in the eternal ache of incompleteness. Bedawa whispers that even in brokenness, there is light. And even in silence, love finds its most haunting language.
A**R
Super
Good
A**A
सबसे अलग प्रेम पर लिखी कहानी
जो बाहर की आँखों से नहीं देख पाता , वो सब कुछ देख लेता है अपने अंदर की आँखों से । सुधीर बचपन से नबीना था , फिर भी एक अकेले कमरे से मोमबतियाँ बनाते हुए सीख गया था दूसरो को पहचानना, उनकी ख़ुशबू से , उनकी आवाज़ से , उनके कदमों की आहट से , जो देखने वाले भी महसूस ना कर सके । बेदावा एक प्रेम कथा यह कहानी है ऐसे प्रेम करने वालो की जो जो मजहब , स्त्री पुरुष से अलग , आंखें ना होने पर भी देख लेना दूसरों में अपने लिए प्रेम । लेखक तरुण भटनागर द्वारा लिखा उपन्यास “ बेदावा “ एक ऐसी लड़की की प्रेम कहानी है जिसके जीवन में प्रेम बचपन में जीवेश के रूप में आता है जो ऐसा अलहड़पन लिए जिसके लिए प्रेम के मायने केवल सबकुछ भूल कर सबकुछ मिटा देना प्रेम में , क्या अपर्णा प्रेम कर पाएगी जीवेश से ? अपर्णा को जिससे प्रेम होता है वो अदीब जो धर्म से मुसलमान , जिसको अपर्णा सबकुछ निछावर कर देती है फिर भी अदीब क्यों प्रेम दे नहीं पाता ,? क्या धर्म की बेड़ियां प्रेम के बीच में आती है या कोई राज़ है जो अदीब को अपर्णा से अलग करता है ? उपन्यास में राजनीति , धर्म , प्रेम , जातिवाद, सभी का समावेश करके , प्रेम को किस माध्यम से दर्शाया है लेखक ने यह अद्भुत है इस उपन्यास में , प्रेम विधा में लिखा यह सबसे हटकर उपन्यास है जो अंत तक आपको जोड़े रखेगा ।
✨**)
Romance+Suspense
This is a romance but it's also infused with suspense, starting with a corpse in a hospital before panning out to our main character, Aparna. She's at the heart of the turbulence between three different types of love, each unique which shapes her as a character. With her, Sudhir, who is a blind man, is also a major part of the story. He may not see, but he's able to observe what others can't see. Book unfolds with different anecdotes told that intertwine. I read out loud some of the antics of Tapas to my mother, we both had a good laugh there. But with these comedic moments of relief, there's also a sense of unease. Knowing the start of this book, with a body, we can't help but ask who's body is this? Why is it there? What happened? And, how does Aparna relates to it all. Read the book for the answers! The book is written in hindi language, the words are mostly simple but there's some Urdu (written in hindi, devnagari script) words & phrases which were hard for me to understand, seeing as I'm a English medium student, maybe. The English words were easy (for me). Each chapter doesn't start a new page, very unlike other romance books that I've read, but it can be it's quirk. Despite these, the writing style is understandable & even poetic in ways. I'm thankful for the author & organiser for my paperback! The book came in good condition, even wrapper in plastic which was new. The cover wasn't as vibrant as the ebook one but the rough texture of it felt good holding.
A**R
Nice read
उपन्यास 'बेदावा' किसी स्त्री पात्र को केंद्र में रखकर लिखा गया उपन्यास है. इस उपन्यास का मुख्य पात्र एक स्त्री है. उपन्यास की यह मुख्य पात्र जिसका नाम अपर्णा है, तक़रीबन सारा उपन्यास उसके ही इर्द- गिर्द घूमता है. अपर्णा की तीन प्रेम कहानियाँ इसमें हैं. रोचक है कि लेखक ने स्त्री के नजरिए से इसे लिखा है. उपन्यास पढ़ते वक़्त मुझे लेव तोल्स्तोय का उपन्यास 'अन्ना कोरेनिना' याद आया यद्यपि यह उससे एकदम अलग है. अन्ना कोरेनिना का मुख्य पात्र भी एक स्त्री है इसलिए यह समानता दिखती है और दोनों ही उपन्यास पुरुष लेखकों के लिखे हुए हैं इसलिए भी. उपन्यास रोचक है यद्यपि इसकी भाषा थोड़ी खटकती है. उर्दू वाली हिन्दी होने से जहां एक ओर इसकी भाषा शायराना किस्म की ho गयी है, वहीं कहीं-कहीं इसे समझ पाना थोड़ा दुरूह भी हो जाता है. पर उपन्यास में जो कहानी है, बल्कि मुख्य पात्र अपर्णा की जो तीन कहानियाँ हैं वे इतनी प्रभावपूर्ण और दिलचस्प हैं कि भाषा की यह जटिलता अखरती नहीं है. यद्यपि यह लेखक का चयन है कि वह किस तरह की भाषा का प्रयोग करे और इस पर पता करने पर यह मालूम चला कि इसमें कुछ मुस्लिम पात्र होने की वजह से ऐसा किया गया है. जो भी हो अगर इस एक चीज को नज़रअंदाज कर दिया जाये तो यकीनन यह एक शानदार उपन्यास है.
R**R
बेहद रोचक प्रेमकथा फिलॉसिफिकल
समीक्षा : बेदावा (उपन्यास) लेखक : तरुण भटनागर प्रकाशक : राजकमल पेपरबैक्स (राजकमल प्रकाशन समूह) प्रथम संस्करण : 2020 कुल पृष्ठ : 160 मोहब्बत, जीवन की वह अन्तःसलिला है, जो मनुष्य को अपने अस्तित्व की प्रामाणिकता से परिचित कराती है। यह वह भाव है जिसकी छाया में इंसान अपने ‘होने’ के मर्म को गहराई से समझने का प्रयास करता है। इस यात्रा में वह जब समाज, धर्म, जाति और लिंगभेद की खुरदरी सच्चाइयों से टकराता है, तब उसकी आत्मा उन अनुभूतियों से सराबोर होती है जिनके लिए कोई पूर्व तैयारी संभव नहीं होती। तरुण भटनागर द्वारा रचित उपन्यास बेदावा भी इसी जीवन-यात्रा का शब्दबद्ध प्रतिबिंब है, जो अपने चार प्रमुख पात्रों (अपर्णा, सुधीर, जीवेश और अदीब ) के माध्यम से इस समाज की जटिलताओं और आंतरिक द्वंद्व को पाठक के समक्ष उद्घाटित करता है। कथा का प्रारंभ अपर्णा और जीवेश के विद्यालयीन जीवन की स्मृतियों से होता है और समय के साथ यह सूत्र अदीब और सुधीर की कथावृत्तियों से होते हुए पुनः अदीब पर समाप्त होता है। दृष्टिहीन सुधीर का पात्र मात्र उसकी नेत्रहीनता का नहीं, अपितु उसके अन्तर्दृष्टि के अनुभवों का संवाहक बनता है, जो हमें देखने से अधिक अनुभव करने का पाठ पढ़ाता है। अपर्णा, जो इस कथा का स्त्री स्वर है, अपने भीतर के भय, मौन, उल्लास और एकाकीपन को जिस प्रकार आत्मीयता से जीती है, वह पाठक के हृदय में एक मूक स्पंदन उत्पन्न करता है। उसका संबंध अदीब, सुधीर और जीवेश से किस प्रकार आकार लेता है — यह जानने हेतु पाठक को इस उपन्यास के पृष्ठों में स्वयं उतरना होगा। लेखक ने धर्म और संप्रदाय की समकालीन राजनीति को अत्यंत सूक्ष्मता और कलात्मकता से कथा के ताने-बाने में समाहित किया है। यह उपन्यास सामाजिक विमर्शों की उन ध्वनियों को समेटे हुए है, जो अनसुनी रह जाती हैं, परंतु समय की आहट बनकर हमारे चारों ओर उपस्थित रहती हैं। ट्रांसजेंडर समुदाय पर लेखक की दृष्टि करुणा और यथार्थ की मिश्रित भाव-भूमि पर अवस्थित है। यद्यपि यह चित्रण उनके अन्तर्मन की गहराइयों में नहीं उतरता, तथापि उनके परिवेश और समाज के दृष्टिकोण को केंद्र में रखकर एक विमर्श प्रस्तुत करता है। उपन्यास में अदीब का चरित्र सर्वाधिक दार्शनिक और आत्ममंथनकारी बनकर उभरता है। वह विचारों का प्रतिरूप है — ऐसा पात्र जो न केवल कथा को, अपितु पाठक के मस्तिष्क को भी एक नवीन दृष्टिकोण से सोचने को विवश करता है। उपन्यास के अंत में, विशेषतः डॉक्टर से जुड़ा दृश्य, इतना प्रखर और मार्मिक है कि वह पाठक के मन में एक गहन उदासी की परत छोड़ जाता है। भाषा-शैली की दृष्टि से उपन्यास एक कोमल पुष्पवाटिका के समान है — जहाँ हिंदी और उर्दू के शब्दों की खुशबू किरदारों के संवादों में रमकर, पाठक को एक साहित्यिक सरसता प्रदान करती है। शैली में सहजता और गहराई दोनों का समन्वय है। हालाँकि, कथानक के मध्य कुछ स्थलों पर गति मन्द प्रतीत होती है — विशेषकर तब जब सुधीर के चरित्र को विभिन्न दृष्टिकोणों से बारंबार प्रस्तुत किया गया है। यह दोहराव यद्यपि उद्देश्यपूर्ण है, फिर भी कभी-कभी जिज्ञासा की लय को धीमा करता है। ‘मोमबत्ती’ का रूपक अत्यंत प्रभावी है। संक्षेप में कहा जाए तो बेदावा कोई साधारण प्रेमकथा नहीं, वरन् एक बहुस्तरीय संवेदनात्मक अनुभव है। यह उपन्यास पाठक को केवल मनोरंजन नहीं, आत्मावलोकन का अवसर देता है। यह वह कृति है जो हृदय को आंदोलित करती है और मन को गहन विचारों के सागर में उतारती है। तरुण भटनागर की लेखनी में जो साहित्यिक प्रौढ़ता और वैचारिक स्पष्टता दृष्टिगोचर होती है, वह उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। उनकी अन्य रचनाओं को पढ़ने की उत्कंठा इस उपन्यास के पश्चात और अधिक तीव्र हो उठती है। यदि आप किसी सच्चे, संवेदनशील और विशिष्ट साहित्यिक अनुभव की तलाश में हैं, तो बेदावा अवश्य पढ़ें। – साहित्ययात्री (१८/०४/२०२५)
A**H
अद्भुत पुस्तक
‘बेदावा’ कोई आम उपन्यास नहीं, यह एक अद्भुत कविता है जो हर पंक्ति में धड़कती है। तरुण भटनागर ने भाषा को ऐसा शायराना जामा पहनाया है कि हर संवाद, हर वाक्य दिल में उतर जाता है। उर्दू मिश्रित हिंदी ने इस उपन्यास को और भी मोहक बना दिया है। मैंने इसे पढ़ते हुए कई बार पन्ने पलटना बंद कर दिया, बस एक-एक पंक्ति को दोहराता रहा—उसकी खूबसूरती को महसूस करता रहा। भावनाओं की गहराई, संवादों की सादगी और विचारों की ऊंचाई—तीनों का ऐसा तालमेल बिरले ही देखने को मिलता है। इसमें सिर्फ प्रेम नहीं, पीड़ा भी है, संघर्ष भी है और समाज की सच्चाइयों का नंगा सच भी। किसी फिल्मी प्रेम कहानी से हटकर यह एक सच्चे इंसानी रिश्ते की बात करता है। मुझे ‘बेदावा’ ने भाषा से प्यार करना सिखाया—उस भाषा से जो दिल में उतर जाए, वहीं घर कर ले।
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